मोल्दोवा की संसद ने मंगलवार, 22 सितंबर को पानी और ऊर्जा आपूर्ति के लिए देशभर में 60 दिन का आपातकाल लागू करने के पक्ष में मतदान किया। सूखे से नदियों का प्रवाह घट रहा है और ऊर्जा की कीमतों से देश पर दबाव बढ़ा है। रॉयटर्स और एपी के अनुसार प्रस्ताव को 54 मत मिले, जबकि 20 सांसदों ने विरोध किया। यह व्यवस्था 26 सितंबर से लागू होगी और आपूर्ति बाधित होने पर सरकार को तेजी से कार्रवाई करने का अधिकार देगी।
पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक डनिएस्टर और प्रुत नदियों में गंभीर जल कमी है। ये नदियां शहरों और जरूरी सेवाओं को पानी देती हैं, और डनिएस्टर पेयजल का प्रमुख स्रोत है। जलस्तर कम रहने से पानी लेने वाले संयंत्रों तथा वितरण प्रणाली पर असर पड़ सकता है। इसके साथ ही ठंड का मौसम करीब आने पर आयातित ऊर्जा की मांग बढ़ने की आशंका है।
मंत्रालय ने बताया कि सितंबर के पहले 20 दिनों में यूक्रेन के नोवोदनिस्त्रोव्स्क जलाशय में औसतन करीब 23 घन मीटर पानी प्रति सेकंड पहुंचा, जबकि नीचे की ओर लगभग 60 घन मीटर प्रति सेकंड छोड़ा गया। इस कारण जलाशय का भंडार लगातार घटा। हाल की बारिश से यूक्रेन में नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र से आने वाले प्रवाह में कोई खास सुधार नहीं हुआ।
प्रधानमंत्री वासिले तोफान ने संसद में कहा कि सूखा, क्षेत्रीय संघर्ष और ऊर्जा बाजार का दबाव एक साथ जोखिम पैदा कर रहे हैं। मोल्दोवा अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा आयात करता है। रॉयटर्स के अनुसार तोफान ने संभावित कमी से पहले भंडार बनाए रखने और ईंधन आयात करने के लिए अधिकार मांगे। विपक्षी सांसदों ने बहस में आपत्ति जताई कि इस फैसले से सरकारी कार्रवाई पर निगरानी कमजोर हो सकती है।
पर्यावरण मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि आपातकाल की घोषणा का मतलब अपने आप पानी की आपूर्ति बंद होना नहीं है। नए अधिकार जरूरत पड़ने पर स्रोतों की रक्षा और घरों तक पानी पहुंचाने के लिए अस्थायी कदम उठाने देते हैं। अधिकारी नदी के प्रवाह तथा जलाशय के भंडार पर नजर रख रहे हैं, जलमार्गों से अवैध अवरोध हटा रहे हैं और वैकल्पिक जल स्रोतों की जानकारी अद्यतन कर रहे हैं।
अधिकारियों ने घरों और कारोबारों से रिसाव ठीक करने, अनावश्यक उपयोग से बचने और पेयजल बचाने की अपील की है। पानी और ऊर्जा क्षेत्रों में मौजूदा सतर्कता व्यवस्था 25 सितंबर को समाप्त होती है। अगले दिन से सरकार को 60 दिनों तक हालात बिगड़ने पर तेजी से कदम उठाने की शक्ति मिलेगी। कोई भी पाबंदी नदियों और आपूर्ति की वास्तविक स्थिति पर निर्भर करेगी; संसदीय मतदान से वह अपने आप लागू नहीं होगी।
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