संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने 4 नवंबर को चेतावनी दी कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने के लिए उपलब्ध धन उनकी जरूरतों से बहुत कम है। नैरोबी में जारी उसकी 2026 की अनुकूलन अंतर रिपोर्ट ने 2035 तक सालाना लगभग 305 अरब डॉलर की जरूरत का अनुमान लगाया है, जबकि समुदाय बढ़ते जलवायु जोखिमों का सामना कर रहे हैं।
यूएनईपी के अनुसार विकसित देशों से विकासशील देशों को मिलने वाला अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक अनुकूलन वित्त 2024 में 28.2–31.7 अरब डॉलर रहा, जो 2023 से केवल एक अरब अधिक है। रॉयटर्स के मुताबिक इस कमी से गरीब देशों के लिए बढ़ती गर्मी की लहरों, सूखे, जंगलों की आग और बाढ़ की तैयारी कठिन हो रही है।
रिपोर्ट के अनुसार कॉप30 की आकांक्षा के अनुरूप 2035 तक यह वित्त तीन गुना होने पर भी महंगाई का समायोजन करने के बाद केवल 20–29 प्रतिशत जरूरतें पूरी होंगी। यूएनईपी ने कहा कि 305 अरब डॉलर के अनुमान में कंपनियों की अपनी अनुकूलन जरूरतें काफी हद तक शामिल नहीं हैं, जो राशि को लगभग दोगुना कर सकती हैं। इसलिए लक्ष्य भविष्य की सभी जरूरतों का वित्तपोषण नहीं है।
यूएनईपी ने जलवायु संबंधी हानि और क्षति की सहायता पर दबाव भी रेखांकित किया। संबंधित कोष के पहले दौर में 2.8 अरब डॉलर के आवेदन आए, जबकि प्रारंभिक उपलब्ध राशि 34.2 करोड़ डॉलर थी। एजेंसी ने कहा कि इससे अधूरी मांग दिखती है, लेकिन हानि और क्षति के लिए वैश्विक वित्त की कमी का आकार अभी ज्ञात नहीं है।
यूएनईपी के अनुसार केवल पैसा प्रभावी अनुकूलन सुनिश्चित नहीं कर सकता। सरकारें जलवायु कानूनों, समन्वय और धन प्रबंधन की व्यवस्था मजबूत कर रही हैं, लेकिन संस्थागत बाधाएं क्रियान्वयन सीमित करती हैं। एजेंसी ने सहायता तक आसान पहुंच, पूर्वानुमान योग्य संसाधन और हानि तथा क्षति की प्रतिक्रियाएं तय करने में प्रभावित समुदायों की भागीदारी मांगी।
ये निष्कर्ष तुर्किये में कॉप31 से पहले आए हैं, जो रॉयटर्स के अनुसार 9–20 नवंबर को निर्धारित है। यूएनईपी की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने वित्त तीन गुना करने की कोशिश के साथ यह मानने को कहा कि जीवन और अर्थव्यवस्थाएं बचाने के लिए और अधिक चाहिए। कार्यक्रम ने कहा कि वार्ता को वादों को सुलभ धन और जलवायु सहनशीलता में मापने योग्य प्रगति में बदलना होगा।
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