साइंस एडवांसेज में 30 अक्टूबर को प्रकाशित वैश्विक अध्ययन ने उपयोग या व्यापार में शामिल वन्य प्रजातियों की संख्या 107,356 आंकी है, जो पहले के लगभग 50,000 के अनुमान से दोगुने से अधिक है। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न विश्वविद्यालय की एलिस ह्यूजेस के नेतृत्व में शोध ने चेताया कि अधूरे रिकॉर्ड जैव विविधता पर दबाव छिपाते हैं।
टीम ने निगरानी कार्यक्रमों और अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय व क्षेत्रीय डेटाबेस की समीक्षा की। कुल संख्या में जीव, पौधे और कवक तथा गैरव्यावसायिक उपयोग शामिल हैं। योनहाप ने स्पष्ट किया कि हर प्रजाति का व्यावसायिक अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रमाणित नहीं है। अध्ययन साक्ष्यों का दायरा बढ़ाता है, व्यापार अचानक दोगुना होने का प्रमाण नहीं देता।
शोध के सार में अधिकतम 47,685 पशु प्रजातियां हैं; शामिल कशेरुकी जीव वर्णित कशेरुकी प्रजातियों का 42 प्रतिशत हैं। अधिकांश देशों में संकटग्रस्त वन्य जीवों और वनस्पतियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधी संधि, यानी साइट्स, से बाहर की प्रजातियों के व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं हैं। लेखकों ने अमेरिकी वन्यजीव व्यापार डेटाबेस को महत्वपूर्ण अपवाद बताया है।
फिज डॉट ऑर्ग पर प्रकाशित विश्वविद्यालय के बयान में ह्यूजेस ने बताया कि यह व्यापार हाथीदांत या चर्चित अवैध उत्पादों से कहीं व्यापक है। इसमें लकड़ी, समुद्री खाद्य, औषधीय पौधे, पालतू जीव, फूल और कवक शामिल हैं और इसका बड़ा हिस्सा वैध है। समीक्षा में किसी प्रजाति की मौजूदगी अपने आप अपराध या असंधारणीय दोहन का प्रमाण नहीं है।
शोधकर्ताओं के अनुसार मात्रा, उत्पत्ति और जंगली आबादी की जानकारी न होने से यह जांचना कठिन है कि उपयोग अस्तित्व को खतरा पहुंचाता है या नहीं। असमान रिपोर्टिंग देशों की तुलना भी सीमित करती है। उनकी चेतावनी है कि निगरानी में प्रजातियों का छोटा हिस्सा आने पर संरक्षण संकेतक संबंधित वन्यजीवों की विविधता को पर्याप्त रूप से नहीं दर्शाते।
टीम ने साइट्स से बाहर की प्रजातियों सहित रिकॉर्ड मानकीकृत करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा करने का प्रस्ताव रखा। ह्यूजेस के अनुसार मौजूदा सीमा शुल्क और पशु स्वास्थ्य जांच प्रक्रियाएं तुलनीय जानकारी जुटाने में मदद कर सकती हैं। ये बदलाव टिकाऊ उपयोग के आकलन में सहायक होंगे; ये शोध की सिफारिशें हैं, अपनाई गई नई वैश्विक निगरानी व्यवस्था नहीं।
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