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फेफड़ों की दीर्घजीवी प्रतिरक्षा कोशिकाओं से फ्लू टीके की नई रणनीति का संकेत

प्रकाशित 31 अगस्त 2026 0 दृश्य

शोधकर्ताओं ने चूहों के फेफड़ों में मोनोसाइट से बनी प्रतिरक्षा कोशिकाओं की एक ऐसी आबादी पहचानी है जो उम्मीद से कहीं अधिक समय तक रहती है और इन्फ्लूएंजा संक्रमण के बाद स्थानीय मेमोरी टी कोशिकाओं को बनाए रखने में मदद करती है। 31 अगस्त को Nature Immunology में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार ये कोशिकाएं गैलेक्तिन-1 प्रोटीन बनाती हैं। चूहों में प्रायोगिक नाक से दिए जाने वाले फ्लू टीके के साथ इस प्रोटीन को जोड़ने पर फेफड़ों की प्रतिरक्षा स्मृति मजबूत हुई। यह श्वसन वायरस के प्रवेश स्थल पर बेहतर सुरक्षा का संभावित रास्ता है, लेकिन मनुष्यों में अभी सिद्ध नहीं हुआ है।

यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर मेडिकल सेंटर की टीम ने ऊतकों में रहने वाली मेमोरी टी कोशिकाओं पर ध्यान दिया। ये संक्रमण के बाद अंगों में बनी रहती हैं और रोगजनक के दोबारा आने पर तेजी से प्रतिक्रिया कर सकती हैं। श्वसन मार्ग में मौजूद ऐसी कोशिकाएं अगली पीढ़ी के फ्लू टीकों का महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं, क्योंकि वे संक्रमण शुरू होने की जगह पर काम करती हैं। विश्वविद्यालय के अनुसार पारंपरिक इंजेक्शन वाले फ्लू टीके बीमारी घटाने में प्रभावी हैं, लेकिन वे श्वसन तंत्र में हमेशा मजबूत स्थानीय प्रतिरक्षा स्मृति पैदा नहीं करते।

मोनोसाइट को आम तौर पर जन्मजात प्रतिरक्षा प्रणाली का कम समय तक जीवित रहने वाला हिस्सा माना जाता है। फिर भी संक्रमण के बाद कोशिकाओं का पता लगाने पर वैज्ञानिकों को मोनोसाइट से बनी एक अलग उप-आबादी मिली, जो चूहों के फेफड़ों में कई महीनों तक बनी रही। इन कोशिकाओं ने स्थानीय मेमोरी टी कोशिकाओं के जीवित रहने और काम करने में सहायता की। इससे संकेत मिलता है कि टिकाऊ प्रतिरक्षा स्मृति केवल अनुकूली टी और बी कोशिकाओं पर निर्भर नहीं है। शोधपत्र ने इस आबादी में गैलेक्तिन-1 की मात्रा अधिक बताई है।

प्रयोगों से संकेत मिला कि गैलेक्तिन-1 फेफड़ों की मेमोरी टी कोशिकाओं को सक्रिय करने और बनाए रखने में मदद करता है। शोधकर्ताओं ने इस प्रोटीन को प्रायोगिक इंट्रानेजल फ्लू टीके में मिलाया तो चूहों के फेफड़ों में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उल्लेखनीय रूप से मजबूत दिखी। यह परिणाम एक जैविक प्रक्रिया और संभावित वैक्सीन सहायक की पहचान है, तैयार उत्पाद नहीं। अध्ययन ने मनुष्यों में फ्लू से बचाव सिद्ध नहीं किया, मानव खुराक तय नहीं की और चिकित्सीय उपयोग से पहले जरूरी सुरक्षा प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया।

यह काम महत्वपूर्ण है क्योंकि इन्फ्लूएंजा अब भी बड़ी संख्या में बीमारियां और मौतें करता है, जबकि मांसपेशी में लगाए जाने वाले टीके वायरस को पहले नाक और फेफड़ों में स्थापित होने से हमेशा नहीं रोकते। श्लैष्मिक प्रतिरक्षा को भरोसेमंद ढंग से बढ़ाने वाला टीका सैद्धांतिक रूप से संक्रमण पर पहले हमला कर सकता है और एंटीबॉडी आधारित सुरक्षा का पूरक बन सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार यही रणनीति भविष्य में अन्य श्वसन वायरस के लिए भी उपयोगी हो सकती है, हालांकि यह व्यापक संभावना भी अभी जांची नहीं गई है।

टीम अब गैलेक्तिन-1 के अधिक स्थिर रूप विकसित कर रही है जिन्हें टीके के सहायक के रूप में इस्तेमाल किया जा सके। आगे के अध्ययनों को प्रक्रिया की पुष्टि, विषाक्तता और सुरक्षा की अवधि का आकलन तथा चूहों के निष्कर्ष मानव प्रतिरक्षा प्रणाली पर लागू होते हैं या नहीं, यह निर्धारित करना होगा। उसके बाद ही परीक्षण चिकित्सीय उपयोगिता बता सकेंगे। फिलहाल शोध प्रतिरक्षा स्मृति की समझ बढ़ाता है और दिखाता है कि जन्मजात प्रतिरक्षा कोशिकाओं की दीर्घजीवी आबादी फेफड़ों में स्थानीय टी कोशिका सुरक्षा को सहारा दे सकती है।

स्रोत: Nature Immunology, University of Rochester Medical Center

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