राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने सोमवार 27 जुलाई को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि मुकदमे की सुनवाई जारी रहने तक उसे डाक मतदान सीमित करने वाले कार्यकारी आदेश के प्रमुख हिस्से लागू करने दिए जाएं। आपात आवेदन में निचली अदालतों के उन फैसलों को अस्थायी रूप से रोकने की मांग की गई है, जिन्होंने 3 नवंबर के मध्यावधि चुनाव से पहले 23 राज्यों और डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया में इन उपायों पर रोक लगाई है। इसी चुनाव से कांग्रेस के नियंत्रण का फैसला होगा।
ट्रंप के 31 मार्च के आदेश में गृह सुरक्षा विभाग को सामाजिक सुरक्षा प्रशासन के साथ मिलकर हर राज्य के लिए उन वयस्क अमेरिकी नागरिकों की सूची बनाने का निर्देश है जिनकी नागरिकता की पुष्टि हो चुकी है। इसमें डाक सेवा से ऐसे नियम तैयार करने को भी कहा गया है जिनके तहत डाक और अनुपस्थित मतपत्र केवल राज्य की भागीदारी सूची में दर्ज पात्र मतदाताओं को सुरक्षित लिफाफों और निगरानी बारकोड के साथ भेजे जाएं। व्हाइट हाउस इन उपायों को चुनावी अखंडता की सुरक्षा और गैर-नागरिकों के अवैध मतदान को रोकने का साधन बताता है।
इन 23 राज्यों और वाशिंगटन के डेमोक्रेटिक अधिकारियों ने मैसाचुसेट्स की संघीय अदालत में मुकदमा दायर किया। उनका तर्क है कि संविधान मुख्य रूप से राज्यों को चुनाव संचालित करने की जिम्मेदारी देता है और राष्ट्रीय नियम बनाने की शक्ति कांग्रेस को सौंपता है, इसलिए राष्ट्रपति अकेले ऐसे बदलाव लागू नहीं कर सकते। संघीय न्यायाधीश इंदिरा तलवानी ने जून में यह दलील स्वीकार की और 2026 के चुनाव में वादी क्षेत्रों के लिए नागरिकता सूची और डाक मतपत्र संबंधी प्रावधानों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी।
प्रथम अमेरिकी सर्किट अपील अदालत के विभाजित पैनल ने सप्ताहांत में तलवानी के आदेश को निलंबित करने से इनकार कर दिया। बहुमत ने कहा कि शरद ऋतु के मतदान की तैयारी के बीच इस व्यवस्था को शुरू करने से भ्रम पैदा हो सकता है और पात्र मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने का खतरा बन सकता है। रोक केवल मुकदमा लाने वाले राज्यों और राजधानी जिले तथा सिर्फ नवंबर के चुनाव पर लागू है; मामले से बाहर के क्षेत्रों पर यह फैसला लागू नहीं होता।
सॉलिसिटर जनरल डी. जॉन सॉयर ने न्यायाधीशों से कहा कि रोक समय से पहले लगाई गई है, क्योंकि संघीय एजेंसियां अभी विचार कर रही हैं कि नीति लागू की जाए या नहीं और उसे कैसे लागू किया जाए। उन्होंने तर्क दिया कि सामान्य अपील प्रक्रिया की प्रतीक्षा से बाद की जीत बेअसर हो सकती है, क्योंकि मतदान से काफी पहले चुनावी प्रक्रियाएं तय करनी होती हैं। राज्यों का कहना है कि नागरिकता के अधूरे रिकॉर्ड और देर से किए गए संचालन बदलाव योग्य नागरिकों को गलती से मतपत्र मिलने से रोक सकते हैं। एसोसिएटेड प्रेस द्वारा उद्धृत संघीय आंकड़ों के अनुसार 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में लगभग 30 प्रतिशत मत डाक से डाले गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती देने वाले राज्यों को 3 अगस्त को पूर्वी समयानुसार शाम चार बजे तक जवाब देने का निर्देश दिया है। इसके बाद न्यायाधीश यह तय कर सकते हैं कि व्यापक अपील के दौरान रोके गए प्रावधान लागू हो सकते हैं या नहीं, हालांकि उनकी अंतिम वैधता का फैसला अभी नहीं होगा। यह निर्णय वादी राज्यों में डाक से मतदान कर सकने वाले लाखों लोगों के तत्काल नियम तय करेगा और मध्यावधि चुनाव से कुछ महीने पहले राष्ट्रपति की शक्ति तथा चुनावों पर राज्यों के नियंत्रण की सीमा की परीक्षा लेगा।
टिप्पणियाँ