चिक्सुलुब क्षुद्रग्रह के टकराव से उड़ी महीन धूल ने पृथ्वी की सतह के पास भीषण गर्मी को फंसा लिया होगा, जिससे 6.6 करोड़ वर्ष पहले आपदा के शुरुआती घंटों में व्यापक आग लगी और खुले में मौजूद जीव मारे गए। Journal of Geophysical Research: Biogeosciences में 28 जुलाई को प्रकाशित सहकर्मी-समीक्षित मॉडलिंग अध्ययन ने एक ऐसी प्रक्रिया प्रस्तावित की है जो समझा सकती है कि आज के युकातान प्रायद्वीप के पास हुए टकराव ने गैर-पक्षी डायनासोरों सहित लगभग तीन चौथाई प्रजातियों को क्यों मिटा दिया।
पर्ड्यू विश्वविद्यालय के नेतृत्व वाले दल ने पुराने शोध के आधार पर बताया कि करीब दस किलोमीटर चौड़े क्षुद्रग्रह ने 1,000 घन किलोमीटर से अधिक स्थलीय पदार्थ को वाष्प बना दिया था। फैलता हुआ गुबार ठंडा होने पर चट्टानी वाष्प का कुछ हिस्सा लगभग 250 माइक्रोमीटर आकार की पिघली बूंदों में बदल गया, जिन्हें स्फेरूल कहा जाता है। ये कण पूरी दुनिया में फैले और नीचे गिरते समय हवा को गर्म करते गए, लेकिन पुराने आकलन बताते थे कि केवल इनकी ऊष्मा शायद विश्व भर के जंगल जलाने के लिए पर्याप्त नहीं थी।
मुख्य लेखक ब्रैंडन जॉनसन और सहयोगियों ने विलुप्ति सीमा की भूवैज्ञानिक परतों के अवलोकनों के आधार पर टकराव के अनुकरण में इससे कहीं महीन धूल की परत जोड़ी। कण लगभग 2.5 माइक्रोमीटर चौड़े थे, यानी स्फेरूल के व्यास का दसवां हिस्सा और मानव फेफड़ों में प्रवेश करने वाले धुएं के कणों के समान। दल की गणना बताती है कि इस अपारदर्शी वैश्विक परत ने अधिकतर गर्मी को अंतरिक्ष में जाने से रोककर जमीन की ओर लौटा दिया होगा।
धूल को शामिल करने पर मॉडल में सतह की गर्मी केवल गिरते स्फेरूल की तुलना में 3.5 गुना अधिक थी। पर्ड्यू के अनुसार ऊष्मीय खुराक मनुष्यों के लिए पूरी तरह घातक माने जाने वाले स्तर से करीब 17 गुना थी और घास, चीड़ की पत्तियों, लाइकेन तथा संभवतः लकड़ी को जलाने के लिए पर्याप्त थी। अध्ययन इसलिए बताता है कि भूमिगत, पानी के भीतर या किसी अन्य अवरोध के पीछे छिप सकने वाले जीवों को तत्काल बड़ा लाभ मिला, जिसके बाद इसी धूल ने सूर्य का प्रकाश रोका और ठंडी प्रभाव-शीतऋतु में योगदान दिया।
लेखकों का कहना है कि परिणाम इस विचार को मजबूत करता है कि केवल खाद्य शृंखलाओं के धीमे पतन के बजाय टकराव ने खुद स्थलीय पारिस्थितिक तंत्रों को तेजी से नष्ट किया। फिर भी प्रश्न सुलझा हुआ नहीं है। शोध में शामिल नहीं रहे जीवाश्म विज्ञानी अल्फियो अलेसांद्रो कियारेंजा ने कहा कि आग के सबसे मजबूत भूवैज्ञानिक प्रमाण अभी उत्तरी अमेरिका से आते हैं, इसलिए वैज्ञानिक अब तक यह सिद्ध नहीं कर पाए हैं कि जंगल की आग पूरे ग्रह पर फैली थी।
भविष्य के क्षेत्रीय अध्ययन को अधिक पूर्ण वैश्विक शैल अभिलेख के सामने इस मॉडल की जांच करनी होगी और पता लगाना होगा कि मेक्सिको से दूरी बढ़ने पर आग के संकेत कमजोर होते हैं या नहीं। इससे स्पष्ट हो सकता है कि कौन से जीव शुरुआती घंटों में बचे, किन जैविक गुणों ने उनकी रक्षा की और तत्काल गर्मी ने वर्षों या दशकों के अंधेरे, ठंडक और प्रदूषित हवा के साथ कैसे असर डाला। नया अध्ययन महीन धूल को दो चरम स्थितियों का संभावित कारक बताता है: पहले घातक गर्मी रोकने वाला ढक्कन और बाद में लंबे पारिस्थितिक संकट को बढ़ाने वाला सूर्यरोधी पर्दा।
टिप्पणियाँ