एक अंतरराष्ट्रीय शोध दल ने हवाई लेज़र मानचित्रण के जरिए दक्षिण-पश्चिमी अमेज़न में पहले दर्ज जानकारी से कहीं बड़े पूर्व-कोलंबियाई समाज के प्रमाण पहचाने हैं। इस तकनीक ने जंगल की छतरी के नीचे सैकड़ों संरचनाओं का पता लगाया। बुधवार को Nature में सामने आए अध्ययन का अनुमान है कि व्यापक क्षेत्र में 24,000 से 30,000 मिट्टी की संरचनाएं हो सकती हैं और उनमें करीब दो-तिहाई अक्विरी सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी हैं।
शोधकर्ताओं ने 2024 में विमान से करीब 4,500 वर्ग किलोमीटर का मानचित्र बनाया और लाइडार परिणामों को उपग्रह चित्रों, ज्ञात पुरातात्विक स्थलों तथा वनों की कटाई वाले इलाकों के सर्वेक्षणों से जोड़ा। जमीन तक पहुंची लेज़र किरणों ने पेड़ों की छतरी के नीचे भूभाग के मॉडल बनाना संभव किया। इनमें ज्यामितीय घेरे, अनुष्ठान केंद्र और ऐसी सड़कें दिखाई दीं जिन्हें सामान्य हवाई तस्वीरें नहीं दिखा पातीं।
El País और हेलसिंकी विश्वविद्यालय के अनुसार, दल ने ब्राज़ील, बोलीविया और पेरू की मौजूदा सीमाओं के पास अक्विरी से जुड़े कम से कम 183,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चिह्नित किया। इसकी दक्षिणी सीमाएं ब्राज़ील के रोंडोनिया और एक्रे के स्थलों, बोलीविया के रिबेराल्टा क्षेत्र और पेरू के पुएर्तो माल्दोनादो के बीच थीं। माना जाता है कि इस संस्कृति ने लगभग 600 ईसा पूर्व से 850 ईस्वी तक इस भू-दृश्य को आकार दिया।
सीधे जांचे गए वनों की कटाई वाले क्षेत्रों में शोधकर्ताओं को केवल उपग्रह सर्वेक्षणों में दर्ज संख्या से बहुत अधिक मिट्टी की संरचनाएं मिलीं। कई अवशेष बड़े वर्ग, वृत्त, अष्टभुज या अधिक जटिल घेरे हैं, जिनके चारों ओर पांच मीटर गहरी खाइयां और ऊंचे तटबंध हैं। स्थलों को जोड़ने वाली सड़कें अलग-थलग बस्तियों के बजाय संगठित आवागमन और आपसी संपर्क का संकेत देती हैं।
आबादी का अनुमान लगाने के लिए दल ने लकड़ी के औजारों से संरचनाओं के निर्माण और रखरखाव में लगे श्रम की गणना की और माना कि एक वयस्क प्रतिदिन करीब एक घन मीटर मिट्टी हटा सकता था। इसके आधार पर प्रति संरचना औसतन लगभग 300 लोगों का समुदाय और 100 से 300 ईस्वी के आसपास पूरे क्षेत्र की अधिकतम आबादी 12.5 लाख से 30 लाख आंकी गई। लेखकों ने स्पष्ट किया कि ये प्रत्यक्ष जनगणना नहीं, बल्कि मॉडल से निकली सीमाएं हैं।
निष्कर्ष इस प्रमाण को मजबूत करते हैं कि यूरोपीय संपर्क से बहुत पहले अमेज़न के कुछ हिस्से घनी आबादी वाले थे और वहां के भू-दृश्य का सुनियोजित प्रबंधन होता था। इससे केवल छोटे और बिखरे समूहों वाली अछूती वनभूमि की पुरानी धारणा को चुनौती मिलती है। शोधकर्ताओं के अनुसार अधिक स्थलों का मैदानी सत्यापन और काल निर्धारण जरूरी है, जबकि रिकॉर्ड का पैमाना बताता है कि अक्षुण्ण जंगल में अभी अनेक संरचनाएं और स्वदेशी भूमि प्रबंधन की पारिस्थितिक विरासत छिपी हो सकती है।
टिप्पणियाँ