रविवार 13 सितंबर को प्रकाशित एक वैज्ञानिक रिपोर्ट ने उन प्रमाणों पर फिर ध्यान खींचा है जिनसे पता चलता है कि मानव-जनित तापवृद्धि उष्णकटिबंधीय प्रशांत और हिंद महासागर के बीच लंबे समय से चले आ रहे जलवायु संबंध को बाधित कर रही है। वुड्स होल ओशनोग्राफिक इंस्टीट्यूशन के शोधकर्ताओं के सहकर्मी-समीक्षित विश्लेषण के अनुसार हाल की कमजोरी लगभग 400 वर्षों की पुनर्निर्मित परिस्थितियों और पिछले एक हजार वर्षों के मॉडल-आधारित कालखंडों की तुलना में भी असाधारण है। यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण है क्योंकि महासागरीय बेसिनों के स्थिर संबंध घनी आबादी वाले उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में वर्षा और अन्य जलवायु बदलावों का अनुमान लगाने में मदद करते हैं।
हिंद महासागर की परिस्थितियां सामान्यतः समुद्री सतह के तापमान और वायुमंडलीय परिसंचरण के जुड़े पैटर्न के माध्यम से प्रशांत महासागर के बड़े बदलावों के साथ चलती रही हैं। वैज्ञानिक 1980 के दशक से इस संबंध में कमजोरी देख रहे हैं, लेकिन भरोसेमंद उपकरण-आधारित रिकॉर्ड एक सदी से भी कम समय के हैं, इसलिए यह संदेह बना रहा कि बदलाव प्राकृतिक उतार-चढ़ाव हो सकता है। दल ने महासागरों को अलग-अलग देखने के बजाय प्रशांत वॉकर परिसंचरण और हिंद महासागर के दो संकेतकों का अध्ययन किया, जिनमें पूरे बेसिन का तापमान मोड और हिंद महासागर वॉकर परिसंचरण शामिल हैं।
समय-श्रृंखला को पीछे ले जाने के लिए प्रमुख लेखक शॉन वांग, डेलिया ओप्पो और कैरोलिन उमेनहोफर ने आधुनिक अवलोकनों को प्रवाल, पेड़ों के वार्षिक छल्लों और गुफाओं की शैल संरचनाओं में सुरक्षित वार्षिक प्रमाणों से जोड़ा। इन अभिलेखों से सत्रहवीं सदी के आरंभ तक हिंद-प्रशांत समुद्री सतह तापमान के पैटर्न का पुनर्निर्माण संभव हुआ। दल ने ग्रीनहाउस गैसों, भूमि उपयोग, सौर ऊर्जा, ज्वालामुखीय गतिविधि और कक्षीय कारकों में बदलाव से संचालित पिछले एक हजार वर्षों के जलवायु सिमुलेशन से भी निष्कर्षों की जांच की। Nature Communications के शोधपत्र ने अधिकांश लक्षित सूचकांकों के लिए दो पुनर्निर्माण विधियों में मजबूत समानता बताई।
रिकॉर्ड दिखाते हैं कि पिछले चार सौ वर्षों के अधिकांश हिस्से में दोनों बेसिन व्यापक रूप से जुड़े रहे, लेकिन लगभग 1810 से 1850 तक एक स्पष्ट अपवाद दिखाई दिया। शोधकर्ताओं ने उस ऐतिहासिक बाधा को बड़े उष्णकटिबंधीय ज्वालामुखी विस्फोटों की श्रृंखला से जोड़ा, जिसमें 1815 का माउंट ताम्बोरा विस्फोट शामिल था, और सिमुलेशन ने ज्वालामुखीय प्रभाव का समर्थन किया। प्रतिक्रिया का आकार विस्फोट की शक्ति और उस समय की जलवायु पर निर्भर था। मॉडल अभिलेख में उन्नीसवीं सदी के आरंभ के कम से कम चार विस्फोटों ने 1991 के माउंट पिनातुबो विस्फोट जितना या उससे अधिक सल्फर समताप मंडल में पहुंचाया।
आधुनिक पैटर्न उस ज्वालामुखीय चरण से अलग है। लेखकों के अनुसार बीसवीं सदी के मध्य से प्रशांत परिसंचरण और हिंद महासागर बेसिन तापमान मोड के बीच संबंध मॉडल में शामिल पिछले एक हजार वर्षों की समान अवधि की तुलना में असाधारण दिखता है। उमेनहोफर ने कहा कि प्रमाण बताते हैं कि वैश्विक तापवृद्धि और मानव उत्सर्जन हिंद महासागर पर प्रशांत के सामान्य प्रभाव से अधिक शक्तिशाली हो रहे हैं। अध्ययन यह नहीं कहता कि दोनों महासागरों ने परस्पर क्रिया बंद कर दी है या पूर्वानुमान बेकार हैं; वह बताता है कि निकट अवधि के अनुमान का ऐतिहासिक रूप से विश्वसनीय स्रोत कम स्थिर हो गया है।
ScienceDaily ने नया विवरण 13 सितंबर को प्रकाशित किया, जबकि Nature Communications ने मुक्त-पहुंच शोधपत्र सबसे पहले 25 अगस्त को और वुड्स होल ने संस्थागत सारांश 26 अगस्त को जारी किया था। अध्ययन को अमेरिकी नेशनल साइंस फाउंडेशन, वुड्स होल इन्वेस्टमेंट इन साइंस प्रोग्राम और संस्थान के अकादमिक कार्यक्रम कार्यालय से सहायता मिली। शोधकर्ताओं के अनुसार जलवायु जोखिम योजना में हिंद महासागर को एक विशाल ऊष्मा भंडार मानना अधिक आवश्यक होगा जो ज्यादा स्वतंत्र व्यवहार कर सकता है, जबकि लगातार अवलोकन और बेहतर मॉडल बदलते संबंध के वर्षा पूर्वानुमानों पर प्रभाव की जांच करेंगे।
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